जीवन में सदा नम्रता को अपनाए रखें। बहुत आनन्द मिलेगा।

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जीवन में सदा नम्रता को अपनाए रखें। बहुत आनन्द मिलेगा।

       
लोग आनंद की प्राप्ति करना चाहते हैं। उसके लिए पुरुषार्थ भी करते हैं। बहुत पुरुषार्थ करते हैं । फिर भी स्थाई आनंद नहीं मिलता तृप्तिदायक आनंद नहीं मिलता। बहुत घटिया स्तर का सुख मिलता है क्षणिक सुख ही मिलता है । जिससे इच्छाएँ शांत नहीं हो पाती।
        
अनेक बार व्यक्ति पुरुषार्थ करता है और कुछ विशेष उपलब्धियां भी प्राप्त कर लेता है। धन संपत्ति सम्मान नौकर चाकर सोना चांदी बंगला गाड़ी उच्च पद आदि, ये सब प्राप्त करके भी उसे तृप्ति नहीं मिलती। बल्कि प्रायः अभिमान ही बढ़ जाता है। और वह अभिमान उसकी बुद्धि को नष्ट करता है। बुद्धि नष्ट होने पर फिर व्यक्ति दूसरों पर अन्याय आरंभ करता है। तब उसका पतन हो जाता है। वह सदा चिंतित दुखी और तनाव युक्त रहता है। इसलिए ऊँची  संपत्तियाँ प्राप्त करके भी अभिमान नहीं करना चाहिए। वह अत्यंत हानिकारक है।  सुख शांति प्राप्ति के लिए, तनाव से मुक्ति पाने के लिए नम्रता को धारण करना चाहिए।
      
 वास्तव में सुख दो प्रकार का है । एक बाह्य सुख, जो इंद्रियों से भोगा जाता है। दूसरा आंतरिक या आध्यात्मिक सुख, जो सेवा परोपकार दान दया सभ्यता नम्रता आदि के आचरण से प्राप्त होता है। यह अंदर वाला आध्यात्मिक सुख कहलाता है।  यह सुख , बाह्य इंद्रियों के रूप रस गंध आदि भोगों से प्राप्त होने वाले सुख की अपेक्षा उत्तम है। 
    
  इसलिए बाह्य रूप रस गंध आदि विषयों का सुख लेने की इच्छा को कम करें। तथा आध्यात्मिक सुख को भोगने की रुचि को बढ़ाएं।
      
 इसके लिए आपको अपने व्यवहार में परिवर्तन करना होगा। बाह्य विषयों की ओर न भागें, बल्कि सभ्यता नम्रता ईश्वर उपासना यज्ञ दान सेवा परोपकार आदि का उत्तम आचरणों को धारण करते हुए आंतरिक सुख को प्राप्त करें। तभी आपका जीवन सुखदायक और सफल बनेगा।

– स्वामी विवेकानंद परिव्राजक
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